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हर कहानी का उद्देश्य एक जैसा नहीं होता। कुछ कहानियाँ केवल मनोरंजन के लिए लिखी जाती हैं, और कुछ कहानियाँ इसलिए, ताकि वे हमारे भीतर छुपे हुए प्रश्नों को जगाएँ,हमें असहज करें,और अंततः हमें सोचने पर मजबूर करें। "शहर,स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक) ऐसी ही एक कहानी है। यह सिर्फ़ चंचल की कहानी नहीं है, यह उन अनगिनत स्त्रियों की कहानी है जो परिस्थितियों के दबाव में ऐसे रास्तों पर धकेल दी जाती हैं जिन्हें उन्होंने कभी चुना ही नहीं। इस उपन्यास में कहानी का उद्भव किसी एक घटना में नहीं, बल्कि समाज की उन परतों में हैं जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ शहर चमकते हैं, रोज़गार के नए अवसर बनते हैं, और आधुनिकता का दावा किया जाता है। लेकिन इसी चमक के पीछे कुछ अंधेरे कोने भी हैं, जहाँ मजबूरी, शोषण और चुप्पी अब भी जीवित हैं। स्पा सेंटर, जो देखने में एक सामान्य व्यवसाय लगता है, कई बार उस अंधेरे का हिस्सा बन जाता है जहाँ शरीर से अधिक आत्म सम्मान का व्यापार होता है।
वह प्रतीक है, उस माँ का जो अपनी बच्ची के भविष्य के लिए हर दर्द सहने को तैयार होती है। उस स्त्री का जो मजबूरी में झुकती है, लेकिन टूटती नहीं। उस आवाज़ का जो देर से सही, लेकिन उठती है। चंचल की यात्रा डर से साहस तक की यात्रा है। चुप्पी से आवाज़ तक की यात्रा है और सबसे महत्वपूर्ण अपने अस्तित्व को पहचानने की यात्रा है। इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्या हर निर्णय स्वेच्छा से लिया जाता है ? समाज अक्सर कहता है, "अगर गलत था, तो छोड़ क्यों नहीं दिया?" लेकिन यह सवाल उन परिस्थितियों को नजरअंदाज कर देता है जहाँ विकल्प ही नहीं होते। गरीबी, जिम्मेदारियाँ, सामाजिक दबाव, ये सब मिलकर ऐसी स्थिति बना देते हैं जहाँ व्यक्ति चुनाव नहीं करता, बल्कि धकेला जाता है।
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