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स्मृतियाँ केवल अतीत की कहानियाँ नहीं होतीं।
वे हमारी पहचान बनाती हैं।
हम कौन हैं, किससे प्रेम करते हैं, किससे घृणा करते हैं, किन बातों पर गर्व करते हैं, किन बातों पर पछताते हैं-इन सबकी नींव हमारी यादों पर टिकी होती है।
लेकिन एक प्रश्न हमेशा छाया की तरह हमारे पीछे चलता है-
क्या होगा यदि हमारी सबसे प्रिय स्मृतियाँ हमारी अपनी ही न हों?
क्या होगा यदि हमारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ कभी घटी ही न हों?
और क्या होगा यदि एक दिन हमें पता चले कि जिस व्यक्ति को हम वर्षों से "मैं" कहते आए हैं, वह किसी और द्वारा रचा गया एक संस्करण है?
उधार का मन केवल एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर नहीं है। यह स्मृति, पहचान, सत्य और मानव चेतना की उन सीमाओं की यात्रा है जहाँ वास्तविकता और भ्रम के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
यह कहानी प्रोफेसर नागार्जुन की है-एक ऐसे व्यक्ति की, जो अपने ही अतीत की जाँच करते-करते यह खोज लेता है कि उसकी स्मृतियाँ शायद उसकी अपनी नहीं हैं। एक रहस्यमय वीडियो, गायब हुए रिकॉर्ड, छिपे हुए प्रयोग, विश्वासघात, और ऐसी सच्चाइयाँ जो मानव मन की नींव को हिला सकती हैं-इन सबके बीच उसे यह तय करना होगा कि सत्य की कीमत क्या होती है।
लेकिन यह केवल उसकी कहानी नहीं है।
यह उन सभी लोगों की कहानी है जिन्होंने कभी अपने निर्णयों, अपनी यादों, या अपनी पहचान पर सवाल उठाया है।
जैसे-जैसे आप इन पृष्ठों को पलटेंगे, आपको ऐसे रहस्य मिलेंगे जो हर उत्तर के साथ नए प्रश्न पैदा करेंगे। ऐसे पात्र मिलेंगे जिन पर भरोसा करना कठिन होगा। और ऐसी सच्चाइयाँ मिलेंगी जो शायद आपको अपनी ही स्मृतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दें।
इस कहानी में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।
यहाँ तक कि स्मृतियाँ भी नहीं।
तो एक प्रश्न अपने साथ लेकर
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