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"नीर क्षीर विवेक" समाज में व्याप्त बुराइयों का चित्रण करता है। इन बुराइयों की शिकार अधिकतर स्त्रियाँ और अबोध बनते हैं। आज तो स्थिति यह है कि दूध पीती बच्ची भी सुरक्षित नहीं।
लड़की गरीब परिवार की हो या अमीर घराने की चुलबुली; हँसमुख लड़की या गाँव में रहने वाली भोली भाली; जवान हो या वृद्ध, वह सुन्दर हो या कुरूप, सब शिकार। कभी कभी औरत ही दूसरी औरत की दुश्मन बन जाती है।
वैज्ञानिक युग में भी परालौकिक चमत्कार होते देखे जा सकते हैं। हम ना तो आत्मा को देख सकते हैं और ना ही परमात्मा को परन्तु दुनिया में इन दोनों का आस्तित्व है। अगर भगवान है तो शैतान भी है।
बच्चे का दूसरा घर उसका विधालय होता है परन्तु कभी कभी विधालय में बच्चों के रक्षक ही उनके भक्षक बन जाते हैं। सर्वगुण सम्पन्न गरीब परिवार की बेटी को अपनी ससुराल में वो सम्मान और स्नेह नहीं मिल पाता जिसकी वो हकदार होती है। वही स्त्री अपने अटूट प्रेम के बल पर जीवन साथी को हर विपदा से बचा कर रखती है। कालग्रस्त होने के बाद भी अपने पति की आत्मा की शांति हेतु वर्षों बाद भी राह निकाल लेती है।
सामाजिक अन्यायों, शैतानों की करतूतों और आत्मा और परमात्मा पर आधारित यह पुस्तक मुख्य रूप से समाज में व्याप्त कुरीतियों को दर्शाती है। आशा है पाठक इस संग्रह का स्वागत करेंगे।