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त्रिशूर को "गोल्डन सिटी ऑफ़ इंडिया" भी कहा जाता है ऐसा इसलिए कि किसी भी अन्य सिटी के मुकाबले त्रिशूर प्रतिवर्ष कम से कम पाँच सौ किलो सोने का उत्पादन करता है। इसे मेरी ईमानदार स्वीकारोक्ति माना जाना चाहिए कि इस उपन्यास के सभी पात्र, जगह काल्पनिक मात्र हैं। किसी भी जीवित / मृत व्यक्ति या जगह से उनकी समानता को संयोग माना जाए। इसके अतिरिक्त त्रिशूर की कहानी में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करके मैंने यही कोशिश की है कि कोई इस पर उंगली ना उठा सके और अंत में सभी पाठकों से ही कहना चाहूँ गी कि "त्रिशूर" एक पंजीकृत उपन्यास है मेरी अनुमति के बिना इसकी नकल या फिल्मांकन करने का प्रयास ना करें अन्यथा गंभीर परिणाम हो सकते हैं। तो चलिए तैयार हो जाइए इस कहानी के रोमांचक सफर पर...
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